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PM Modi Poverty Claim: क्या सच में 25 करोड़ भारतीय गरीबी से बाहर निकले? जानिए पीएम मोदी के दावे का पूरा सच

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में गरीबी कम होने और करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव आने का दावा किया है। मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पिछले एक दशक में देश के करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। उन्होंने इसे भारत में बेहतर होते शासन, बढ़ते अवसरों और आर्थिक बदलाव का परिणाम बताया।

प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद गरीबी के आंकड़ों और उसे मापने के तरीके पर चर्चा तेज हो गई है। आखिर 25 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर आने का दावा किस आधार पर किया गया है? क्या इसका मतलब यह है कि इतने लोगों की आय गरीबी रेखा से ऊपर चली गई है, या इसके पीछे कोई दूसरा पैमाना है? इसे समझने के लिए गरीबी मापने की मौजूदा व्यवस्था पर नजर डालना जरूरी है।

पीएम मोदी ने क्या कहा?

ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में हुए बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि देश ने पिछले दस वर्षों में करीब 25 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकालने में सफलता हासिल की है।

उन्होंने भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम का उदाहरण देते हुए बताया कि देश में नए कारोबार और नवाचार के अवसर पहले के मुकाबले बढ़े हैं। छोटे शहरों में भी स्टार्टअप की मौजूदगी बढ़ने से प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार की शक्ति का इस्तेमाल नागरिकों को अपने ऊपर निर्भर बनाए रखने के बजाय उन्हें सशक्त बनाने के लिए होना चाहिए।

गरीबी से बाहर आने के दावे का आधार क्या है?

पीएम मोदी के 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का दावा नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी से संबंधित रिपोर्ट के आंकड़ों पर आधारित है। इस आकलन में केवल लोगों की आय या खर्च को नहीं देखा जाता, बल्कि यह भी जांचा जाता है कि उन्हें जीवन की बुनियादी सुविधाएं कितनी उपलब्ध हैं।

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2013-14 से 2022-23 के बीच भारत में लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। यह आंकड़ा करीब 25 करोड़ के बराबर है।

इस आकलन में ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (OPHI) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के तकनीकी सहयोग से विकसित बहुआयामी गरीबी सूचकांक की पद्धति का इस्तेमाल किया गया।

क्या होती है बहुआयामी गरीबी?

आमतौर पर गरीबी की चर्चा करते समय लोगों की आय या रोजाना होने वाले खर्च को आधार बनाया जाता है। लेकिन बहुआयामी गरीबी का आकलन इससे व्यापक है।

इसमें यह देखा जाता है कि किसी व्यक्ति या परिवार को स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़ी जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं।

इसके तहत पोषण, बच्चों की स्कूली शिक्षा, स्कूल में उपस्थिति, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास और घरेलू संपत्तियों जैसे संकेतकों को ध्यान में रखा जाता है।

इसका मतलब है कि यदि किसी परिवार की आय में बड़ा बदलाव नहीं हुआ, लेकिन उसे पहले की तुलना में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, बिजली, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाएं मिलने लगीं, तो बहुआयामी गरीबी के आकलन में उसकी स्थिति बेहतर हो सकती है।

भारत में गरीबी रेखा कैसे तय होती रही है?

भारत में लंबे समय तक गरीबी का आकलन मुख्य रूप से घरेलू उपभोग खर्च के आधार पर किया जाता रहा है। वर्ष 2011-12 के लिए तेंदुलकर समिति की पद्धति के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग खर्च 816 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 1,000 रुपये को गरीबी रेखा के रूप में इस्तेमाल किया गया था।

बाद में रंगराजन समिति ने 2014 में एक अलग पद्धति की सिफारिश की। इसके तहत वर्ष 2011-12 के मूल्यों पर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 972 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 1,407 रुपये से कम होने पर व्यक्ति को गरीब माना गया था।

हालांकि, ये आंकड़े उस समय के मूल्य स्तर पर आधारित थे। इन्हें आज की कीमतों के हिसाब से सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

तेंदुलकर और रंगराजन समिति में क्या अंतर था?

तेंदुलकर समिति ने गरीबी के आकलन के लिए उपभोग खर्च को आधार बनाया और भोजन के साथ स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे खर्चों को भी ध्यान में रखा। हालांकि, इसकी गरीबी रेखा को कम होने के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

इसके बाद रंगराजन समिति ने भोजन और पोषण के अलावा कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य जरूरी खर्चों को शामिल करते हुए गरीबी मापने की वैकल्पिक पद्धति सुझाई।

दोनों समितियों की पद्धतियां आय या उपभोग आधारित गरीबी को मापने से जुड़ी थीं। वहीं, बहुआयामी गरीबी सूचकांक लोगों के जीवन में मौजूद अलग-अलग प्रकार की वंचनाओं को मापता है।

तो क्या पीएम मोदी का दावा सही है?

उपलब्ध नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2013-14 से 2022-23 के बीच लगभग 24.82 करोड़ लोगों के बहुआयामी गरीबी से बाहर आने का अनुमान लगाया गया है। इस लिहाज से प्रधानमंत्री का करीब 25 करोड़ लोगों वाला दावा नीति आयोग के इसी आकलन से मेल खाता है।

लेकिन इस आंकड़े को समझते समय एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान में रखना चाहिए। बहुआयामी गरीबी से बाहर निकलने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि सभी संबंधित लोगों की आय किसी निर्धारित मौद्रिक गरीबी रेखा से ऊपर चली गई हो।

यह आंकड़ा स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़ी वंचनाओं में कमी को दर्शाता है। इसलिए भारत में गरीबी की वास्तविक स्थिति समझने के लिए बहुआयामी गरीबी के आंकड़ों के साथ-साथ आय, उपभोग खर्च और जीवन-यापन की लागत से जुड़े आंकड़ों को भी देखना जरूरी है।

कुल मिलाकर, पीएम मोदी का दावा नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी रिपोर्ट पर आधारित है। हालांकि, गरीबी कम होने की व्यापक तस्वीर समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आंकड़ा किस पद्धति से निकाला गया है और उससे वास्तव में क्या निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

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