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पूजा में कपूर जलाने का क्या महत्व है? जानें धार्मिक मान्यताओं के पीछे की वजह

हिंदू धर्म में पूजा और आरती के दौरान कपूर जलाने की परंपरा काफी पुरानी है। धार्मिक मान्यताओं में कपूर को शुद्धता, प्रकाश, त्याग और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। आरती के समय कपूर की लौ और इसकी सुगंध पूजा के वातावरण को शांत और सुखद बनाने में भी मदद करती है।

कपूर जलकर पूरी तरह हो जाता है समाप्त

कपूर की खासियत है कि यह जलने के बाद लगभग पूरी तरह समाप्त हो जाता है और सामान्य तौर पर ठोस राख नहीं छोड़ता। इसी वजह से धार्मिक रूप से इसे अहंकार और ‘मैं’ की भावना छोड़कर ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित होने का प्रतीक माना जाता है।

मान्यता है कि जिस तरह कपूर जलकर अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है, उसी तरह व्यक्ति को भी अपने अहंकार और स्वार्थ का त्याग कर भक्ति और समर्पण का भाव अपनाना चाहिए।

कपूर की लौ देती है प्रकाश का संदेश

आरती के दौरान कपूर की चमकती लौ को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह लौ अज्ञान को दूर कर ज्ञान और आत्म-जागरूकता की ओर बढ़ने का संदेश देती है। इसलिए आरती में कपूर की ज्योति को केवल रोशनी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक प्रकाश का प्रतीक भी माना जाता है।

त्याग और निस्वार्थ भक्ति का प्रतीक

कपूर मोम की तरह धीरे-धीरे पिघलने के बजाय जलकर समाप्त हो जाता है। इसी विशेषता को धार्मिक मान्यताओं में त्याग और निस्वार्थ भक्ति से जोड़ा गया है। इसका भाव यह है कि सच्ची भक्ति में व्यक्ति को स्वार्थ और अपेक्षाओं से ऊपर उठकर ईश्वर के प्रति समर्पण रखना चाहिए।

आरती के बाद लौ पर हाथ क्यों फेरते हैं?

आरती समाप्त होने के बाद श्रद्धालु कपूर की लौ के ऊपर हाथ फेरकर उसे माथे या चेहरे तक ले जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसे ईश्वर की आरती से प्राप्त आशीर्वाद और सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करने का प्रतीक माना जाता है।

कपूर की सुगंध पूजा के वातावरण को भी सुगंधित बनाती है। हालांकि कपूर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होने जैसी बातें धार्मिक और लोक-मान्यताओं का हिस्सा हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता।

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