घटती जन्मदर से बढ़ी चिंता, क्या भारत भी चीन जैसी चुनौती की ओर बढ़ रहा?

भारत में पिछले कुछ वर्षों में प्रजनन दर में लगातार गिरावट देखी जा रही है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश की कुल प्रजनन दर (TFR) करीब 1.9 तक पहुंच गई है, जो आबादी को लंबे समय में स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है।
जन्मदर में गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण बताए जाते हैं। इनमें बढ़ता शहरीकरण, शिक्षा का विस्तार, देर से विवाह, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, परिवार नियोजन के साधनों की उपलब्धता और बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च शामिल हैं।
अगर कम प्रजनन दर लंबे समय तक जारी रहती है, तो आने वाले दशकों में भारत की आबादी की उम्र बढ़ने की रफ्तार तेज हो सकती है। इससे कामकाजी उम्र की आबादी में कमी, बुजुर्गों की संख्या में बढ़ोतरी और स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ने जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
चीन इसका एक उदाहरण है, जहां लंबे समय से कम जन्मदर के कारण आबादी के वृद्ध होने और कार्यबल में कमी जैसी जनसांख्यिकीय चुनौतियां सामने आई हैं। हालांकि, भारत की स्थिति चीन से अलग है और भारत के पास अभी भी बड़ी युवा आबादी मौजूद है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के लिए चुनौती यह है कि मौजूदा युवा आबादी को बेहतर शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर देकर उत्पादक बनाया जाए। साथ ही, बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं की भविष्य की जरूरतों पर भी ध्यान देना होगा।



