मेक इन इंडिया के 12 साल: मोबाइल से इलेक्ट्रॉनिक्स तक बदली भारत की मैन्युफैक्चरिंग तस्वीर

नई दिल्ली। भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनाने के उद्देश्य से 25 सितंबर 2014 को शुरू किए गए ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को करीब 12 साल पूरे हो गए हैं। इस दौरान देश में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना यानी PLI समेत कई नीतिगत कदम लागू किए गए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन पहलों का असर मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य उत्पादन क्षेत्रों में दिखाई दिया है।
PLI से निवेश और उत्पादन में बढ़ोतरी
सरकार ने 14 प्रमुख सेक्टरों में PLI योजना लागू की है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2026 तक इससे जुड़े कार्यक्रमों के तहत 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वास्तविक निवेश हुआ। इसी अवधि में 22.66 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का उत्पादन और बिक्री दर्ज की गई, जबकि 15.20 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात हुआ।
सरकार के मुताबिक इन योजनाओं से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 14.15 लाख से अधिक रोजगार के अवसर जुड़े हैं।
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा विस्तार
मेक इन इंडिया के प्रभाव को मोबाइल फोन निर्माण के आंकड़ों से भी समझा जा सकता है। वर्ष 2014-15 में भारत में करीब 18,000 करोड़ रुपये के मोबाइल फोन का उत्पादन होता था। 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 6.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
मोबाइल फोन के निर्यात में भी इसी अवधि में तेज वृद्धि दर्ज की गई। 2014-15 में करीब 1,500 करोड़ रुपये के मोबाइल फोन निर्यात किए गए थे, जो 2025-26 में बढ़कर 2.59 लाख करोड़ रुपये हो गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत अब दुनिया के प्रमुख मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों में शामिल है।
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर का भी हुआ विस्तार
मोबाइल निर्माण के साथ भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का आकार भी बढ़ा है। 2014-15 में देश में करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों का उत्पादन हुआ था। 2025-26 में यह आंकड़ा करीब 13.11 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।
इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों का निर्यात करीब 38,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.24 लाख करोड़ रुपये हो गया। सरकार के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से करीब 25 लाख लोगों के लिए रोजगार के अवसर जुड़े हैं।
विदेशी कंपनियों ने भी बढ़ाई भारत में मौजूदगी
मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ने के साथ कई वैश्विक कंपनियों ने भारत में अपना उत्पादन बढ़ाया है। मोबाइल क्षेत्र में एप्पल के कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स भारत में आईफोन का निर्माण कर रहे हैं, जबकि सैमसंग भी देश में बड़े पैमाने पर मोबाइल फोन बनाता है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भी कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में उत्पादन और निवेश का विस्तार किया है।
इसका असर केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा। मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के साथ कंपोनेंट सप्लायर, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार के अवसर बढ़े हैं।
एक्सपोर्ट बढ़ने से बढ़ी वैश्विक भूमिका
भारत में उत्पादन बढ़ने का असर निर्यात के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। घरेलू उत्पादन का एक हिस्सा वैश्विक बाजारों में पहुंचने से भारत की सप्लाई चेन में भूमिका बढ़ी है। खास तौर पर मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में निर्यात में दर्ज हुई वृद्धि इस बदलाव को दर्शाती है।
सिर्फ एक योजना नहीं, कई नीतियों का संयुक्त असर
मैन्युफैक्चरिंग में हुए बदलाव को केवल मेक इन इंडिया का नतीजा मानना पूरी तस्वीर नहीं बताता। FDI, PLI, टैक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सुधारों सहित कई नीतियों ने मिलकर उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भूमिका निभाई है।
पिछले करीब 12 वर्षों के आंकड़ों से यह जरूर सामने आता है कि भारत में मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का पैमाना काफी बढ़ा है। निवेश, उत्पादन, निर्यात और रोजगार के आंकड़े बताते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग अब भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक बन चुका है।



