भोपाल में किसानों का बवाल, आखिर कौन है जो मुख्यमंत्री से किसानों को दूर कर रहा?

दिल्ली के जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन ने सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। सोमवार को जिस तरीके से हजारों किसान मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने के लिए शहर के भीतर घुसे और चक्काजाम करके बैठ गए, उसने पूरे शहर के ट्रैफिक को तहस—नहस कर दिया।
पूरा शहर सोमवार शाम से जाम और बैरिकेडिंग की चपेट में है। स्कूलों की छुट्टी कर दी गई है, लोग शहर के भीतर आने जाने में परेशानी झेल रहे हैं, लेकिन सरकार और किसानों के बीच में अभी तक कोई समझौते का रास्ता निकलता दिखाई नहीं दे रहा है। आखिर किसानों का यह आंदोलन यहां तक कैसे पहुंचा और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव के करीबी लोग खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव को मुश्किल में डाल रहे हैं?
दरअसल, किसानों के संगठनों ने मूंग खरीदी को लेकर सरकार को अल्टीमेटम दिया था। आंदोलन की चेतावनी के बीच में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव से मिलकर बात करने की बात कही थी। किसान संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मिलने का समय भी मांगा। सबसे महत्वपूर्ण बात, सीएम हाउस के अफसरों ने मुख्यमंत्री से मिलाने का आश्वासन देकर प्रतिनिधिमंडल को सीएम हाउस भी बुला लिया। पूरे दिन किसानों को बैठाकर रखा गया, लेकिन मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं हुई। उल्टा यह कहकर लौटा दिया गया कि मुख्यमंत्री नहीं मिलेंगे। यहीं से आंदोलन के विस्तार की रूपरेखा पिछले हफ्ते बन गई।
किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने वापस नर्मदापुरम जाकर पूरी स्थिति स्पष्ट की। गुस्सा बढ़ा तो भोपाल कूच का ऐलान किया गया। घोषणा की गई कि किसान नर्मदापुरम से पैदल भोपाल के लिए कूच करेंगे और वहां पर मुख्यमंत्री निवास का घेराव करेंगे। ऐलान के बाद किसान कूच के लिए नर्मदापुरम के सेठानी घाट में इकठ्ठे हुए, वहां से भोपाल के लिए कूच कर गए। दो हजार से ज्यादा किसान भोपाल के लिए कूच किए, सरकार और उनकी एजेंसियों ने इसको लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। किसान रविवार की रात ओबेदुल्लागंज पहुंच गए और सुबह भोपाल के लिए कूच किया। इसके बाद फिर संगठन के लोगों को बातचीत के लिए बुलाया गया, लेकिन इन्हें मंत्रालय में बैठा दिया गया। स्थिति जब स्पष्ट नजर नहीं आई तो किसान भोपाल के लिए निकल गए।
सोमवार दोपहर तक किसान भोपाल में 11 मील तक आ गए। यहां पर बैरिकेडिंग लगाकर रोकने की कोशिश की गई, लेकिन किसानों ने उसको तोड़ते हुए आगे बढ़ना जारी रखा। शाम तक भोपाल शहर में प्रवेश कर गए और गदर शुरू हो गया। उसके बाद पूरा शहर परेशान हो गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर कौन वो लोग थे, जो सीएम हाउस से किसानों से बात कर रहे थे और उन्होंने आंदोलन को बढ़ने दिया? सवालों में मुख्यमंत्री के करीबी लोग भी हैं कि जब उन्हें सब कुछ पता था तो उन्होंने मुख्यमंत्री को क्यों नहीं बताया और मामले को इतना गंभीर हो जाने दिया। किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को बुलाकर मुख्यमंत्री से मुलाकात क्यों नहीं कराई गई? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री के करीबी लोग खुद मुख्यमंत्री को मुश्किल में डाल रहे हैं?



