ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों पर विदेशी नेटवर्क का दावा, फंडिंग को लेकर उठे सवाल

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे प्रदर्शनों के बीच विदेशी नेटवर्क और फंडिंग को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। अमेरिकी मीडिया संस्थान फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट में फ्रांस में हुए छात्र प्रदर्शनों और भारत में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच कथित वैचारिक और संगठनात्मक संबंधों का दावा किया गया है।
भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार अस्रा नोमानी ने फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट को साझा करते हुए सोशल मीडिया पर दावा किया कि उन्होंने पहले भारत को इस कथित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का अगला केंद्र बनने की आशंका जताई थी और अब भारत में विरोध प्रदर्शन होते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, इन दावों को लेकर स्वतंत्र रूप से यह स्थापित नहीं हुआ है कि भारत में जारी प्रदर्शनों का संचालन किसी विदेशी संगठन के निर्देश या फंडिंग से हो रहा है।
नेविल रॉय सिंघम का नाम चर्चा में
नोमानी ने अपने दावों में कारोबारी नेविल रॉय सिंघम का भी उल्लेख किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सिंघम से जुड़े नेटवर्क ने अलग-अलग देशों में वामपंथी विचारधारा और चीन समर्थक नैरेटिव को बढ़ावा देने वाले संगठनों को आर्थिक मदद दी है।
रिपोर्ट में सिंघम से जुड़े एक संगठन को वर्ष 2017 में करीब 2.244 करोड़ डॉलर नहीं, बल्कि 22.44 मिलियन डॉलर की कथित फंडिंग दिए जाने का उल्लेख किया गया है। इसी वित्तीय नेटवर्क के आधार पर फ्रांस और भारत समेत अलग-अलग देशों में सक्रिय संगठनों के बीच संभावित संबंधों की चर्चा की गई है।
नोमानी ने लेखक और अकादमिक विजय प्रसाद को सिंघम का करीबी वैचारिक सहयोगी और आयोजक भी बताया है। हालांकि, इन आरोपों और भारत में चल रहे मौजूदा प्रदर्शनों के बीच प्रत्यक्ष वित्तीय संबंध का स्वतंत्र प्रमाण सामने आना अभी बाकी है।
छात्र संगठनों की भूमिका पर भी चर्चा
दिल्ली में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) समेत विभिन्न छात्र संगठनों की भागीदारी सामने आई है। कुछ रिपोर्टों में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का भी उल्लेख किया गया है।
इन संगठनों की ओर से चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराया गया है। दूसरी ओर, नोमानी और फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट इन आंदोलनों को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय वैचारिक नेटवर्क के संदर्भ में देखती है।
दावों और तथ्यों के बीच अंतर जरूरी
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अलग-अलग देशों में सक्रिय संगठनों के बीच वैचारिक या वित्तीय संबंधों को सीधे भारत में हो रहे प्रदर्शनों की विदेशी फंडिंग का प्रमाण माना जा सकता है। उपलब्ध दावों से नेटवर्क और संगठनों के बीच कुछ संबंधों की चर्चा जरूर होती है, लेकिन इससे यह स्वतः साबित नहीं होता कि भारत में जारी प्रत्येक प्रदर्शन विदेशी फंडिंग या किसी बाहरी शक्ति के निर्देश पर आयोजित किया जा रहा है।
ऐसे में इस मुद्दे पर सामने आए दावों को उनके स्रोत और संदर्भ के साथ देखना जरूरी है। फिलहाल विदेशी फंडिंग और भारत के मौजूदा प्रदर्शनों के बीच प्रत्यक्ष संबंध का दावा आरोप और रिपोर्टिंग के स्तर पर है, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।



