किसानों को कृषि वैज्ञानिकों की सलाह, 30 जुलाई तक पूरी करें धान की रोपाई

- बीज उपचार, जैव उर्वरक और लेही पद्धति अपनाने पर जोर
- खरपतवार नियंत्रण और संतुलित उर्वरक प्रबंधन से बढ़ेगा उत्पादन
रायपुर, छत्तीसगढ़ में मानसून अब सक्रिय हो चुका है। शुरुआती दौर में मानसून के आगमन में करीब 10 दिनों की देरी हुई, लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में हुई अच्छी बारिश के बाद खेतों में पर्याप्त नमी और पानी उपलब्ध हो गया है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान मौसम खरीफ फसलों, विशेषकर धान की बुआई और रोपाई के लिए अनुकूल है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे मौसम का पूरा लाभ उठाते हुए समय पर कृषि कार्य पूरा करें, ताकि उत्पादन पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बताया कि इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव के कारण मानसून सामान्य समय से देर से पहुंचा, जिससे जून माह में औसत से लगभग 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। हालांकि जुलाई के पहले सप्ताह में लगातार बारिश होने से रायगढ़ जिले सहित अधिकांश मैदानी क्षेत्रों में खेतों में पर्याप्त जल उपलब्ध हो गया है। ऐसे में जहां नर्सरी तैयार है वहां मचाई कर तुरंत धान की रोपाई शुरू कर देनी चाहिए। जिन किसानों के पास नर्सरी उपलब्ध नहीं है, वे लेही पद्धति से अंकुरित बीजों की बुआई ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से कर सकते हैं।
कृषि वैज्ञानिकों ने रायगढ़ जिले के किसानों को सलाह दी है कि जो किसान धान की सीधी बुआई करते हैं, वे 15 जुलाई तक यह कार्य पूरा कर लें। वहीं रोपाई एवं बियासी पद्धति अपनाने वाले किसान 30 जुलाई तक रोपाई कर लें। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए किसानों को शीघ्र एवं मध्यम अवधि (125-130 दिन) में पकने वाली धान की किस्मों का चयन करने की सलाह दी गई है। इनमें इन्द्रावती, छत्तीसगढ़ बारानी, इंदिरा एरोबिक, एमटीयू-1010, एमटीयू-1153, एमटीयू-1156, एमटीयू-1001, विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान-1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी तथा महामाया जैसी किस्में शामिल हैं, जो बदलते मौसम के अनुरूप बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं।
विशेषज्ञों ने कहा है कि धान की बुआई से पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम अथवा अन्य उपयुक्त कवकनाशी से उपचारित करना आवश्यक है। प्रति किलोग्राम बीज में ढाई ग्राम दवा का उपयोग करना चाहिए। इसके साथ ही एजोस्पाइरिलम, पीएसबी एवं केएसबी जैसे जैव उर्वरकों से बीज उपचार करने से फसल को पर्याप्त नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश उपलब्ध होती है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम होती है। जिन क्षेत्रों में लगातार वर्षा हो रही है और खेतों में पानी भरा हुआ है, वहां लेही पद्धति अपनाने की सलाह दी गई है। इसके लिए धान के बीजों को 8 से 10 घंटे तक पानी में भिगोकर 24 से 30 घंटे तक अंकुरित किया जाए। इसके बाद मचाई किए गए खेतों में ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से बुआई की जाए। इस पद्धति में प्रति एकड़ लगभग 40 किलोग्राम बीज का उपयोग उपयुक्त माना गया है।
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि रायगढ़ जिले में धान की सीधी बुआई वाले खेतों में खरपतवार सबसे बड़ी समस्या बन सकती है। यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो उत्पादन में 50 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इसलिए बुआई के बाद पहले 40 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है। इसके लिए 20 एवं 40 दिन बाद हाथ से निंदाई, पैडी वीडर या आवश्यकता अनुसार अनुशंसित खरपतवारनाशी का प्रयोग किया जा सकता है। उर्वरक प्रबंधन के संबंध में किसानों को सलाह दी गई है कि प्रति एकड़ अधिकतम दो बोरी यूरिया, एक बोरी डीएपी तथा आधी बोरी पोटाश का उपयोग करें। डीएपी और पोटाश की पूरी मात्रा बुआई या रोपाई से पहले डालें, जबकि यूरिया की पहली खुराक 30 से 35 दिन और दूसरी खुराक 60 से 70 दिन बाद दें। इसके साथ ही हरी खाद और नील हरित काई के उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। विभाग ने रायगढ़ जिले के किसानों से अपील की है कि खेती से संबंधित किसी भी समस्या या तकनीकी जानकारी के लिए निकटस्थ कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि अनुसंधान केंद्र, कृषि महाविद्यालय अथवा कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क करें, ताकि समय पर उचित सलाह लेकर खरीफ फसल का बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।



