नवरात्रि में कन्या पूजन पर हलवा-पूरी और काले चने ही क्यों बनते हैं? जानें 9 कन्याओं के साथ बालक को बैठाने का रहस्य

Navratri Kanya Pujan: नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की आराधना के बाद कन्या पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। इस परंपरा में छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में पूजकर उन्हें भोजन कराया जाता है। कई घरों में हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद तैयार किया जाता है। इसके साथ ही नौ कन्याओं के बीच एक छोटे बालक को भी भोजन कराने की परंपरा देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं में इन सभी रीति-रिवाजों का अपना खास महत्व बताया गया है।
कन्या पूजन में हलवा-पूरी और काले चने क्यों बनाए जाते हैं?
उत्तर भारत के कई इलाकों में हलवा, पूरी और काले चने कन्या पूजन के पारंपरिक प्रसाद का हिस्सा हैं। नवरात्रि के समापन पर अष्टमी या नवमी के दिन भक्त कन्याओं को आमंत्रित करते हैं और श्रद्धापूर्वक भोजन कराते हैं। इस परंपरा के जरिए मां दुर्गा के प्रति आस्था व्यक्त करने के साथ-साथ कन्याओं का सम्मान भी किया जाता है।
हलवा: प्रसाद में मिठास का प्रतीक
सूजी, घी और चीनी से तैयार किया जाने वाला हलवा कन्या पूजन की थाली का प्रमुख हिस्सा है। धार्मिक अवसरों पर मीठा भोजन शुभता और प्रसन्नता से जोड़ा जाता है। कन्याओं को हलवा खिलाना उनके प्रति प्रेम, श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का एक पारंपरिक तरीका है।
पूरी: पारंपरिक पकवान की खास जगह
हलवे के साथ पूरी परोसने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। गेहूं के आटे से बनी पूरी कई धार्मिक आयोजनों और त्योहारों में तैयार की जाती है। कन्या पूजन में इसे प्रसाद के रूप में हलवे और चने के साथ परोसा जाता है।
काले चने: कन्या पूजन की थाली का अहम हिस्सा
काले चनों को उबालकर मसालों के साथ तैयार किया जाता है। कई परिवार इन्हें बिना प्याज और लहसुन के बनाते हैं। हलवा-पूरी के साथ काले चने परोसना उत्तर भारत में प्रचलित धार्मिक परंपरा है। हालांकि, इन तीनों व्यंजनों के पीछे किसी एक सर्वमान्य धार्मिक कारण की जगह क्षेत्रीय रीति-रिवाजों और पारिवारिक परंपराओं की भी अहम भूमिका है।
कन्या पूजन में नौ कन्याओं को क्यों बुलाया जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों को समर्पित होते हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। इसी आस्था के चलते कन्या पूजन में नौ कन्याओं को आमंत्रित कर देवी के स्वरूप के रूप में उनका पूजन किया जाता है।
इस दौरान उनके पैर धोने, तिलक लगाने, भोजन कराने और सामर्थ्य के अनुसार उपहार या दक्षिणा देने की परंपरा है। इसका मुख्य भाव कन्या स्वरूप में देवी का सम्मान करना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है। कुछ परिवारों में कन्याओं की संख्या और पूजा की विधि स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग भी हो सकती है।
नौ कन्याओं के साथ एक बालक को क्यों बैठाया जाता है?
कन्या पूजन के दौरान नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भोजन कराने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। इस बालक को अलग-अलग जगहों पर ‘लंगूरा’, ‘लांगुरिया’ या ‘बटुक’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उसे भगवान भैरव का प्रतीक माना जाता है।
मान्यता है कि भगवान भैरव मां दुर्गा के रक्षक हैं और देवी की आराधना के साथ उनकी पूजा का भी विशेष स्थान है। इसी विश्वास के चलते कन्याओं के साथ बालक को भी भोजन कराया जाता है और उसे तिलक लगाकर सम्मान दिया जाता है।
हालांकि, यह परंपरा हर क्षेत्र और परिवार में एक जैसी नहीं है। कहीं बालक को अनिवार्य रूप से आमंत्रित किया जाता है, तो कहीं कन्या पूजन की विधि अलग होती है।
कन्या पूजन का मुख्य संदेश क्या है?
कन्या पूजन केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा और सम्मान से जुड़ी परंपरा भी है। इसमें छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर आदर दिया जाता है और उन्हें भोजन कराकर आशीर्वाद लिया जाता है। हलवा-पूरी, काले चने और बालक को भोजन कराने की प्रथा इसी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।
इस तरह नवरात्रि में कन्या पूजन के माध्यम से भक्त मां दुर्गा के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं और बच्चों के सम्मान व सत्कार का संदेश भी देते हैं।



