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कानून से ऊपर वर्दी? सिविल लाइन थाने के पुलिसकर्मी की दबंगई ने खोली ‘डबल स्टैंडर्ड’ की पोल

रायपुर। रायपुर में कानून का राज आम जनता के लिए है, लेकिन क्या वर्दीधारियों के लिए नहीं? सिविल लाइन थाने में पदस्थ पुलिसकर्मी दुष्यंत जशपाल खुलेआम यातायात नियमों को रौंदते नज़र आ रहे हैं। बिना हेलमेट, बिना इंश्योरेंस, बिना प्रदूषण प्रमाण-पत्र, और अवैध ढोलकी साइलेंसर लगी बाइक से पूरे शहर में दबंगई से घूमना—यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम को खुली चुनौती है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि संबंधित पुलिसकर्मी के नाम पर ऑनलाइन चालान भी कट चुका है, फिर भी न नियमों की परवाह, न कानून का डर। सवाल सीधा है—
जब चालान के बाद भी वर्दी में बैठे लोग न सुधरें, तो आम जनता से क्या अपेक्षा की जाए?
यह वही पुलिस है जो आम नागरिक को हेलमेट न पहनने पर रोकती है, चालान काटती है, उपदेश देती है। लेकिन जब खुद पुलिसकर्मी ही कानून तोड़ते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं रहता—यह पूरे पुलिस तंत्र की साख पर तमाचा है।
❗ क्या सत्ता का संरक्षण है?
❗ क्या विभागीय कार्रवाई सिर्फ कागज़ों तक सीमित है?
❗ क्या कानून सिर्फ गरीब और आम आदमी के लिए है?
इस तरह की बेलगाम हरकतें यह संदेश देती हैं कि वर्दी कानून से ऊपर है, और यही सोच लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अगर समय रहते ऐसे मामलों पर सख्त और सार्वजनिक कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का भरोसा व्यवस्था से पूरी तरह टूट जाएगा।
यह संज्ञान में लाया जाता है कि दुस्यंत जशपाल, जो वर्तमान में सिविल लाइन थाना में पदस्थ हैं, के संबंध में यातायात नियमों के उल्लंघन से जुड़े तथ्य सामने आए हैं।
प्राप्त जानकारी एवं उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार संबंधित पुलिसकर्मी द्वारा—
बिना हेलमेट दोपहिया वाहन चलाया गया, जबकि इस उल्लंघन पर पूर्व में ऑनलाइन चालान भी निर्गत किया जा चुका है।
वाहन के लिए वैध बीमा (Motor Vehicle Insurance) तथा प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) उपलब्ध नहीं पाया गया।
दोपहिया वाहन में अनधिकृत/संशोधित (ढोलकी) साइलेंसर का उपयोग किया गया, जो मोटर वाहन अधिनियम एवं पर्यावरणीय मानकों के विरुद्ध है।
उपरोक्त कृत्य मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 129, 146, 190(2) एवं संबंधित नियमों के अंतर्गत दंडनीय प्रतीत होते हैं। साथ ही, एक पुलिसकर्मी द्वारा नियमों का उल्लंघन किया जाना सेवा आचरण नियमों एवं विभागीय अनुशासन के प्रतिकूल है।
यह तथ्यात्मक स्थिति दर्शाती है कि यदि कानून प्रवर्तन से जुड़े कार्मिक स्वयं नियमों का पालन नहीं करते, तो इससे कानून के समान अनुपालन (Equality before Law) के सिद्धांत तथा पुलिस विभाग की सार्वजनिक छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अतः सक्षम प्राधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि उपरोक्त तथ्यों का तटस्थ परीक्षण, उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन कर विधिसम्मत एवं विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि कानून के शासन में जनता का विश्वास बना रहे।
अब सवाल उठना चाहिए—
क्या सरकार और पुलिस मुख्यालय इस खुले उल्लंघन पर कार्रवाई करेंगे,
या फिर वर्दी की आड़ में कानून कुचला जाता रहेगा?

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