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नालंदा विधानसभा सीट: जदयू के गढ़ में राजद को कभी नहीं मिली जीत, श्रवण कुमार का 30 साल से कब्जा

विश्व इतिहास में ज्ञान की भूमि के रूप में दर्ज नालंदा बिहार की राजनीति में भी अहम स्थान रखता है। गुप्त काल में स्थापित प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है। इसकी चर्चा चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने भी की है। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। नालंदा विधानसभा क्षेत्र वर्ष 1977 में अस्तित्व में आया। शुरुआती दौर में इस सीट पर कांग्रेस के श्यामसुंदर प्रसाद और निर्दलीय उम्मीदवार राम नरेश सिंह बारी-बारी से जीतते रहे। दोनों ने पहले चार चुनावों में दो-दो बार जीत हासिल की। लेकिन, 1990 में यहां बदलाव आया। नीतीश कुमार के राजनीतिक उभार के बाद पहले समता पार्टी और फिर जदयू ने यहां पैठ बनाई। तब (1990) से लेकर पिछले विधानसभा चुनाव (2020) तक यहां श्रवण कुमार जीतते रहे हैं। 2015 के चुनाव को छोड़ दें तो हर बार उनकी जीत भी भारी मतों के अंतर से हुई।

2015 में श्रवण कुमार ने भाजपा प्रत्याशी कौशलेंद्र कुमार को सिर्फ 2,996 वोटों के अंतर से हराया था। तब जदयू ने एनडीए से अलग होकर महागठबंधन के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था। साढ़े तीन दशक में विपक्ष ने श्रवण की राह रोकने को कई बार व्यूह रचना की, लेकिन वह कभी पराजित नहीं हुए। कुर्मी और कुशवाहा बहुल नालंदा क्षेत्र में जदयू को अति पिछड़ी जातियों का भी समर्थन मिलता रहा है, जो जीत की राह को आसान करता है। यहां के परिणाम को नीतीश कुमार की लोकप्रियता से भी जोड़कर देखा जाता है।

नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करने की कोशिश

प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम डलरिम्पल ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को ‘अपने समय का हार्वर्ड, ऑक्सब्रिज और नासा’ कहा था। नालंदा का इतिहास भगवान बुद्ध (छठी-5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) एवं जैन धर्म के संस्थापक भगवान महावीर से भी जुड़ा हुआ है। पारंपरिक विवरण इसे राजा अशोक, महाबली जरासंध एवं नागार्जुन (द्वितीय-तृतीय शताब्दी ईस्वी) जैसे महाप्रतापी राजाओं और प्रारंभिक बौद्ध आचार्यों से जोड़ते हैं। लेकिन, पुरातात्विक प्रमाण इसे गुप्त काल (पांचवीं शताब्दी ईस्वी) में स्थापित बताते हैं। विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय करीब एक सहस्राब्दी तक समृद्ध रहा। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।

नालंदा विधानसभा सीट एक नजर में

नालंदा विधानसभा क्षेत्र में नूरसराय और बेन प्रखंड की पंचायतों के अलावा सिलाव, बिहारशरीफ और राजगीर प्रखंडों का कुछ हिस्सा भी शामिल है। 90 के दशक से पहले यहां कांग्रेस का दबदबा रहा। लेकिन, 1985 के बाद कांग्रेस को यहां कभी जीत नहीं मिली। राजद और भाजपा का कभी यहां खाता नहीं खुला। यहां कुल मतदाताओं की संख्या 3,18,853 है। इनमें से पुरुष 1,68,252 और 1,50,593 महिला वोटर हैं। युवा मतदाताओं की संख्या लगभग 40 प्रतिशत है। नालंदा विधानसभा के पूर्व में अस्थावां एवं राजगीर, पश्चिम में हिलसा और इस्लामपुर, उत्तर में हरनौत एवं बिहारशरीफ और दक्षिण में राजगीर पड़ता है।

पांच साल में दिखे ये बदलाव

⦁ अधारी नदी की उड़ाही से हजारों एकड़ में सिंचाई की सुविधा बहाल हुई

⦁ टूरिस्ट वे ऑफ राजगीर, सरमेरा-बिहटा और इस्लामपुर-बेन-सिलाव जैसे महत्वपूर्ण रोड का निर्माण हुआ

⦁ अधिकतर गांवों में सड़क एवं बिजली पहुंची

⦁ दर्जनों स्थानों पर जलापूर्ति केंद्र की स्थापना की गई

⦁ सिंचाई की सुविधा के लिए आहर, पईन और नदियों की उड़ाही हुई

वायदे जो पूरे नहीं हुए

⦁ कुछ गांवों में अब भी पेयजल संकट।

⦁ बड़गांव की प्रसिद्धि के अनुकूल सुविधाओं का अभाव।

⦁ नूरसराय के संगतपर में जलभराव।

⦁ कई गांवों में जलनिकासी का अभाव।

2025 में चुनाव के मुद्दे

⦁ कुछ गांवों को बारहमासी सड़क से जोड़ना

⦁ रोजगार के अवसर पैदा करना

⦁ कल-कारखाना खोलना

⦁ सिंचाई के लिए नहर व्यवस्था करना

नालंदा में अब तक हुए चुनावों के विजेता

1977 : श्याम सुंदर प्रसाद (कांग्रेस)

1980 : राम नरेश सिंह (निर्दलीय)

1985 : श्याम सुंदर प्रसाद (कांग्रेस)

1990 : राम नरेश सिंह (निर्दलीय)

1995 : श्रवण कुमार (समता पार्टी)

2000 : श्रवण कुमार (समता पार्टी)

2005 (फरवरी) : श्रवण कुमार (जदयू)

2005 (अक्टूबर) : श्रवण कुमार (जदयू)

2010 : श्रवण कुमार (जदयू)

2015 : श्रवण कुमार (जदयू)

2020 : श्रवण कुमार (जदयू)

नालंदा के विधायक सह ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार का दावा है कि क्षेत्र में पईनों एवं पोखरों की उड़ाही हुई है। नदियों से गाद हटाकर सिंचाई की सुविधा बहाल की गई। पेयजल संकट दूर करने के लिए कई स्थानों पर उच्चप्रवाही जलापूर्ति केंद्रों की स्थापना की गई है। हर टोले को पक्की सड़क से जोड़ा गया है। बाढ़ एवं सुखाड़ से निजात के लिए कई काम किए गए हैं।

प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी कौशलेंद्र कुमार उर्फ छोटे मुखिया का आरोप है कि सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार चरम पर है। कोई काम बिना घूस के नहीं होता। कई पंचायतों के लोग अक्सर बाढ़ से जूझते हैं। वहीं, कई ऐसी पंचायतें हैं, जहां पेयजल संकट है। पैमार नदी का मुंह नहीं खुलवाया गया, जिससे सिंचाई समस्या बरकरार है। इस बार 30 साल बनाम 5 साल की लड़ाई होगी।

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