क्या 33 साल से कायम बृजमोहन का किला ध्वस्त कर पाएँगे महंत राम सुंदर दास

रायपुर. राजधानी रायपुर की चारों सीटाें पर एक बार फिर से कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है। इस बार का सबसे दिलचस्प मुकाबला रायपुर दक्षिण में होने वाला है। दक्षिण विधानसभा के विधायक और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का तिलिस्म कांग्रेस पिछले 33 सालों से तोड़ नहीं पाई है। अब उनके तिलिस्म काे तोड़ने के लिए कांग्रेस ने एक नया दांव खेलते हुए दूधाधारी मठ के महंत रामसुंदर दास को मैदान में उतारा है।
महंत जी का वैसे बृजमोहन से अलग ही आत्मीय नाता है। वे उनके कामों की सराहना भी करते रहे हैं। बृजमोहन भी महंत जी को बहुत मानते हैं। इनके बीच का मुकाबला बड़ा दिलचस्प होगा। इस मुकाबले में क्या नतीजा आएगा यह तो वक्त बताएगा, लेकिन राजनीति के विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि महंत के चुनाव मैदान में आने से बृजमोहन की राह अब कठिन हो गई है, क्योंकि पिछले चुनाव में कन्हैया अग्रवाल के कारण बृजमोहन की जीत का अंतर कम हो गया था।
मप्र के जमाने में रायपुर में दो ही विधानसभा थी, एक रायपुर शहर और एक रायपुर ग्रामीण। रायपुर शहर से पहली बार 1990 में भाजपा ने बृजमोहन अग्रवाल पर दांव खेला तो उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता स्वरूपचंद जैन को मात देकर अपनी जीत का खाता खोला। इसी के साथ कांग्रेस के गढ़ को भी ध्वस्त किया। इसके पहले कभी भी रायपुर से कोई भी भाजपा का विधायक नहीं जीता था। मप्र के जमाने में रायपुर शहर और रायपुर ग्रामीण दोनों में कांग्रेस का दबदबा रहता था। यहां से कोई भी भाजपा का प्रत्याशी जीत नहीं पाता था। ऐसे में भाजपा ने पहली बार 1990 में रायपुर शहर से जब युवा छात्र नेता बृजमोहन अग्रवाल को मैदान में उतारा तो सभी को आश्चर्य हुआ कि यह छात्र नेता क्या कर लेगा, लेकिन इस छात्र नेता ने कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाई और स्वरूपचंद जैन जैसे दिग्गज नेता को मात देने का काम किया। इस जीत पर किसी को यकीन नहीं हो रहा था।
मप्र के जमाने में जीत की हैट्रिक
रायपुर शहर से एक बार जीतने के बार यह सीट पूरी तरह से बृजमोहन अग्रवाल की होकर रह गई। उन्होंने इस सीट पर इस तरह से कब्जा किया कि उनके अलावा और किसी काे टिकट देने के बारे में भाजपा ने कभी सोचा भी नहीं। 1990 के बाद जब तीन साल में 1993 में मध्यावधि चुनाव हुए तो यहां भी भाजपा ने बृजमोहन पर दांव खेला और उन्होंने पारस चोपड़ा को मात देकर दूसरी बार चुनाव जीता। तीसरा चुनाव 1998 का राजकमल सिंघानिया को मात देकर जीता।
कोई जातिगत समीकरण नहीं
आमतौर पर किसी भी विधानसभा में जातिगत और अन्य समीकरण ज्यादा मायने रखते हैं, लेकिन दक्षिण विधानसभा में कोई जातिगत समीकरण नहीं है। यहां पर व्यक्तिगत समीकरण के कारण ही जीत मिलती है। यहां पर किसी विशेष जाति समुदाय का दबदबा नहीं है। यही वजह है कि इस सीट पर लगातार बृजमोहन अग्रवाल का दबदबा रहा है।
छत्तीसगढ़ बनने के बाद चार जीत
2000 में मप्र से अलग होकर छत्तीसगढ़ बना तो पहली बार चुनाव 2003 में हुए। इस समय भी रायपुर शहर से बृजमोहन को टिकट मिली तो उन्होंने कांग्रेस के गजराज पगारिया को मात देकर चुनाव जीता। इसके बाद 2008 में परिसीमन किया गया और रायपुर शहर और ग्रामीण की दो विधानसभाओं के स्थान पर चार विधानसभाओं में बदला गया। बृजमोहन के हिस्से में दक्षिण विधानसभा आई। यहां पर 2008 के पहले चुनाव में उन्होंने योगेश तिवारी को हराया। इसके बाद 2013 के चुनाव में महापौर रहीं किरणमयी नायक को परास्त किया। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने कन्हैया अग्रवाल को खड़े किया तो उसको भी मात ही मिली। कुल मिलाकर अब तक कांग्रेस बृजमोहन का किला ध्वस्त करने में सफल नहीं हो सकी है।
इस बार कांग्रेस का नया दांव
कांग्रेस ने बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ कई तरह के दांव खेलकर देख लिए हैं। पिछले चुनाव में अग्रवाल के खिलाफ अग्रवाल को मैदान में उतार कर देखा। इसका एक ही फायदा यह हुआ कि बृजमोहन की जीत का अंतर कम हो गया। अब कांग्रेस ने इस बार नया दांव खेलते हुए दूधाधारी मठ के महंत को मैदान में उतारा है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि वे इस बार बृजमोहन का किला ध्वस्त कर देंगे। लेकिन भाजपा और बृजमोहन को जानने वालों का मानना है कि बृजमोहन अग्रवाल का अपना एक तय वोट बैंक है जो उनको ही मतदान करता है। ऐसे में यह चुनाव वास्तव में दिलचस्प होगा।