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पत्रकारों को बड़ी राहत: सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी बरी, ढाई साल बाद आया फैसला

रायपुर/बिलासपुर। पत्रकार सुनील नामदेव, नीलेश शर्मा और साजिद हाशमी को अदालत से बड़ी राहत मिली है। बिलासपुर की अदालत ने करीब ढाई साल से चल रहे मामले में तीनों पत्रकारों को बरी कर दिया है। फैसले के बाद पत्रकारिता जगत में इस मामले को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है।

2023 में दर्ज हुआ था मामला

मामला वर्ष 2023 में भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग और प्रकाशन-प्रसारण को लेकर दर्ज किया गया था। इसके बाद तीनों पत्रकारों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन के साक्ष्यों और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। बचाव पक्ष की ओर से कुछ गवाहों के बयानों को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

गवाहों के बयान से जांच पर उठे सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस कार्रवाई और दस्तावेजों को लेकर गवाहों के बयानों पर सवाल उठे। बचाव पक्ष का दावा था कि कुछ लोग मोबाइल गुम होने की शिकायत लेकर थाने पहुंचे थे और उनसे कथित रूप से खाली कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए।

बाद में इन्हीं दस्तावेजों के इस्तेमाल का आरोप बचाव पक्ष ने लगाया। हालांकि इन दावों की वास्तविक स्थिति अदालत के विस्तृत आदेश में दर्ज निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगी।

सुनील नामदेव को पहले भी मिल चुकी है राहत

सुनील नामदेव इससे पहले NDPS मामले को लेकर भी कानूनी कार्रवाई का सामना कर चुके हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रायपुर की विशेष NDPS अदालत ने उस मामले में भी उन्हें बरी किया था।

इस मामले में NDPS एक्ट की धाराओं 50 और 52 से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर भी अदालत के समक्ष सवाल उठे थे। इससे पहले बिलासपुर हाईकोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत दी थी।

फिर चर्चा में आया पत्रकारिता और सत्ता का सवाल

तीनों पत्रकारों के बरी होने के बाद पत्रकारिता और आपराधिक कार्रवाई को लेकर बहस फिर तेज हो सकती है। पत्रकारों से जुड़े लोगों का आरोप रहा है कि तत्कालीन कांग्रेस शासनकाल में सरकार और प्रशासन से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों पर दबाव बनाने के लिए कानूनी कार्रवाई का इस्तेमाल किया गया।

हालांकि किसी भी मामले को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताने का निष्कर्ष केवल आरोपों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए FIR, जांच रिकॉर्ड और अदालत के विस्तृत फैसले में दर्ज तथ्यों को देखना जरूरी है।

ढाई साल बाद अदालत का फैसला

करीब ढाई साल चली कानूनी लड़ाई के बाद आया यह फैसला तीनों पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत है। अब पूरे मामले में अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों को किस आधार पर स्वीकार या अस्वीकार किया और बरी करने के पीछे क्या प्रमुख कारण रहे, यह विस्तृत न्यायिक आदेश से स्पष्ट होगा।

फिलहाल इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल जरूर सामने ला दिया है कि पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामलों में जांच की प्रक्रिया, साक्ष्यों की विश्वसनीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस तरह कायम रखा जाए।

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