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रोज मर रहा एक किसान…1 साल में 327 किसानों ने दी जान, यवतमाल से आई दिल दहला देने वाली रिपोर्ट!

रोज मर रहा एक किसान…1 साल में 327 किसानों ने दी जान, यवतमाल से आई दिल दहला देने वाली रिपोर्ट!

कर्ज का बोझ, अतिवृष्टि का संकट, फसलों का भारी नुकसान, उपज का कम भाव और मुआवज़ा व अनुदान में हो रही देरी… इन सभी कारणों से किसान पूरी तरह हताश हो चुका है। परिणामस्वरूप जिले में किसान आत्महत्या की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। पिछले 11 महीने 17 दिनों में कुल 327 किसानों ने विभिन्न कारणों से मौत को गले लगाया है।

आंकड़ों पर नज़र डालें तो जिले में आत्महत्याओं का ‘ग्राफ’ बढ़ता दिखाई दे रहा है। औसतन हर दिन कम से कम एक किसान आत्महत्या कर रहा है। इस वर्ष बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और अतिवृष्टि ने खेती की पूरी व्यवस्था चरमरा दी। सोयाबीन को भारी नुकसान हुआ और उसके बाद कपास की फसल भी वापसी की बारिश से चौपट हो गई।

सोयाबीन और कपास को मिलने वाली कीमतों में भी कोई तालमेल न होने से किसानों की चिंता और बढ़ गई है। आगामी हंगामे की अनिश्चितता, परिवार की जबाबदारी, बच्चों की पढ़ाई, घर खर्च… इन सब चिंताओं में किसान घिरा हुआ है। इस बार लगातार हुई अतिवृष्टि ने किसानों की परेशानियाँ और बढ़ा दीं।

बीते दिनों हुई चार बार की भारी बारिश से 6 लाख 55 हजार हेक्टेयर फसलें बर्बाद हुईं और 5,30,736 किसान प्रभावित हुए। 1 इनमें से अधिकांश किसान अभी भी सरकारी मदद की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हर साल की तरह इस वर्ष भी ‘असमानी और सुलतानी’ दोनों संकटों ने किसानों को घेर रखा है। यही कारण है कि किसान मानसिक रूप से टूटकर आत्महत्या जैसे चरम कदम उठा रहा है। किसानों के सामने यह हंगामे की मार जिंदा रहने या मरने का सवाल बनकर खड़ा है।

इस बीच जिले में नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों की धूम मची हुई है। किसानों को उम्मीद थी कि चुनावी माहौल में नेता घोषणा कर राहत देंगे, लेकिन किसानों के संकट पर कोई ठोस कदम उठता नजर नहीं आ रहा। अतिवृष्टि, कर्ज़बोझ और घाटे की खेती से जूझ रहे किसानों को अब तक कोई बड़ा दिलासा नहीं मिला है।

जिले में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं अगस्त महीने में हुई। इस दौरान कुल 49 किसानों ने मौत को गले लगाया। इस दौरान दो बार हुई भारी बारिश में हजारों हेक्टेयर फसलें जलमग्न हो गईं। भारी नुकसान और कर्ज़ के बोझ के चलते कई किसान मानसिक दबाव में आ गए और आत्महत्या के मामले बढ़ते गए।

निरंतर फसलों की बर्बादी, कर्ज़बोझ, फसल को न मिलने वाला भाव… इन सभी कारणों से किसान तनाव में आत्महत्या कर रहे हैं। लेकिन दुख की बात यह कि आत्महत्या के बाद भी सरकार ‘पात्र’–‘अपात्र’ का निर्णय करती है, जिससे कई परिवार सहायता से वंचित रह जाते हैं।

11 महीनों में किसानों की आत्महत्या आंकड़े

महीनाआत्महत्यापात्रअपात्रलंबित
जनवरी2816120
फ़रवरी201271
मार्च3220111
अप्रैल2510141
मई3515200
जून241077
जुलाई273618
अगस्त490148
सितंबर370037
अक्टूबर410041
नवंबर9009
कुल3278678163
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